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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 46
प्रमुदित हृदयँ सराहत भल भवसागर। जहँ उपजहिं अस मानिक बिधि बड़ नागर॥
वे सानन्द हृदय से सराहना करने लगे कि ‘यह भवसागर बड़ा अच्छा है, जिसमें ऐसे उत्तम माणिक्य पैदा होते हैं। वास्तव में ब्रह्मा बड़े ही चतुर हैं।’
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