रघुबर भुज बल देखि उछाह बरातिन्ह।
मुदित राउ लखि सनमुख बिधि सबभाँतिन्ह॥
श्रीरामचन्द्रजी के बाहुबल को देखकर बरातियों को बड़ा हर्ष हुआ और विधाता को सब प्रकार सम्मुख अर्थात् अनुकूल जानकर महाराज दशरथ प्रसन्न हुए।
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