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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 119
होत बिरह सर मगन देखि रघुनाथहि। फरकि बाम भुज नयन देत जनु हाथहि॥
श्रीरामचन्द्रजी को देखकर वे विरह के सरोवर में डूब रही हैं। उस समय उनके बाम भुजा और नेत्र फड़ककर मानो डूबने से बचाने के लिये हाथ बढ़ाते हैं।
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