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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 127
कर कमलनि जयमाल जानकी सोहइ। बरनि सकै छबि अतुलित अस कबि को हइ॥
जानकीजी के करकमलों में जयमाला शोभा दे रही है; भला ऐसा कौन कवि है, जो उस अतुलित छबि का वर्णन कर सके।
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