प्रथम सुनत जो राउ राम गुन-रूपहि।
बोलि ब्याहि सिय देत दोष नहिं भूपहि॥
यदि महाराज (शर्त करने से) पहले श्रीरामचन्द्रजी का रूप और गुण सुन लेते तो इन्हें बुलाकर जानकीजी को ब्याह देते। उस समय ऐसा करने में महाराज को कोई दोष स्पर्श नहीं करता।
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