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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 67
सुचि सुजान नृप कहहिं हमहि अस सूझई। तेज प्रताप रूप जहँ तहँ बल बूझई॥
शुद्ध हृदय के ज्ञानवान् राजा लोग कहने लगे 'हमको तो ऐसा जान पड़ता है कि जहाँ तेज, प्रताप और सुन्दरता होती है, वहीं बल भी जान पड़ता है।'
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