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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 118
कहि न सकति कछु सकुचति सिय हियँ सोचइ। गौरि गनेस गिरीसहि सुमिरि सकोचइ॥
संकोचवश जानकीजी कुछ कह नहीं पाती, मन-ही-मन सोच करती हैं और पार्वती, गणेश तथा महादेवजी का स्मरण करके उन्हें संकोच में डाल रही हैं।
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