परसि कमल कर सीस हरषि हियँ लावहिं।
प्रेम पयोधि मगन मुनि पार न पावहिं॥
वे अपने करकमल से श्रीरामचन्द्रजी के मस्तक का स्पर्श करते हैं और हर्षित होकर उन्हें हृदय से लगाते हैं। इस समय मुनिवर प्रेम-सागरमें डूब जाते हैं। उसकी थाह नहीं पाते।
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