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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 109
पारबती मन सरिस अचल धनु चालक। हहिं पुरारि तेउ एक नारि ब्रत पालक॥
यह धनुष तो पार्वतीजी के मन के समान अचल है, इसे विचलित करने वाले तो बस एक महादेवजी ही हैं, किंतु वे भी एकनारी व्रत का पालन करने वाले हैं।
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