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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 149
मध्य बरात बिराजत अति अनुकूलेउ। मनहुँ काम आराम कलपतरु फूलेउ॥
वे बरात के मध्य में अत्यन्त प्रसन्न चित्त से सुशोभित हैं, ऐसा जान पड़ता है, मानो कामदेव के बाग में कल्पवृक्ष फूला हुआ हो।
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