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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 231
बिकसहिं कुमुद जिमि देखि बिधु भइ अवधसुख सोभामई। एहि जुगुति राम बिबाह गावहिं सकल कबि कीरति नई॥
जैसे चन्द्रमा को देखकर कुमुदिनियाँ खिल उठती हैं वैसे ही सब स्त्रियाँ आनन्दित हैं। उस समय अयोध्या सुखी और शोभामयी हो रही हैं। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के विवाह की सुन्दर नवीन कीर्ति को कवि लोग गाते हैं।
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