नट भाट मागध सूत जाचक जस प्रतापहि बरनहीं।
सानंद भूसुर बूंद मनि गज देत मन करषै नहीं॥
नट, भाट, मागध, सूत और याचकगण महाराज के सुयश और प्रताप का वर्णन कर रहे थे और ब्राह्मणवृन्द को आनन्दपूर्वक मणि और हाथी आदि देते-देते उनका मन हटता न था, अर्थात् बराबर देते ही रहने की इच्छा होती थी।
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