सीय सहित सब सुता सौंपि कर जोरहिं।
बार बार रघुनाथहि निरखि निहोरहिं॥
वे जानकीजी के सहित सब पुत्रियों को (अपने-अपने पति को) सौंपकर हाथ जोड़ती हैं और बार-बार श्रीरामचन्द्रजी को निहारकर उनसे विनय करती हैं—
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