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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 211
जनि छोह छाड़ब बिनय सुनि रघुबीर बहुबिनती करी। मिलि भेटि सहित सनेह फिरेउ बिदेह मनधीरज धरी॥
स्नेह न छोड़ियेगा - इस विनय को सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने बहुत विनती की और महाराज जनक (सबसे) प्रेमसहित मिल-भेंटकर तथा मन में धीरज धारण कर लौट आये।
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