धीरज धरेउ सुर बचन सुनि कर जोरि कह कोसल धनी।
करुना निधान सुजान प्रभु सो उचित नहिं बिनती घनी॥
गुरुजी के वचन सुनकर महाराज ने धैर्य धारण किया और फिर कोसलेश्वर महाराज दशरथ ने हाथ जोड़कर कहा—’प्रभो! आप दयासागर और सारी परिस्थिति से अभिज्ञ हैं; अतः आपके सामने बहुत विनय करना उचित नहीं है।'
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