पुन्य पयोधि मातु पितु ए सिसु सुरतरु।
रूप सुधा सुख देत नयन अमरनि बरु॥
इनके माता-पिता पुण्य के समुद्र हैं, जिनके नेत्ररूप देवताओं को ये बालकरूप कल्पवृक्ष अपने सौन्दर्य-सुधाका सुख प्रदान करते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
जानकी मंगल के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
जानकी मंगल के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।