सब मल बिछोहनि जानि मूरति जनक कौतुक देखहू।
धनु सिंधु नृप बल जल बढ्यो रघुबरहि कुंभज लेखह॥
हे जनक! इस मूर्ति को सब प्रकार के मलों को छुड़ाने वाली जानकर यह कौतुक देखो। धनुषरूपी समुद्र में राजाओं का बलरूपी जल बढ़ा हुआ है, (उसे सुखाने के लिये) रघुनाथजी को अगस्त्य के समान जानो।
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