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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 120
धीरज धरति सगुन बल रहति सो नाहिन। बरु किसोर धनु घोर दइउ नहिं दाहिन॥
इस प्रकार शकुन के बल से कुछ धीरज धरती हैं; परंतु वह स्थिर नहीं रहता। (वे सोचने लगती हैं कि) ‘वर तो किशोरावस्था के हैं और धनुष विकराल है। इस समय विधाता भी अनुकूल नहीं है।’
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