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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 145
गे जनवासहिं कौसिक राम लखन लिए। हरणे निरखि बरात प्रेम प्रमुदित हिए॥
कौशिकमुनि श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणजी को साथ लिये जनवासे में गये और बरात को देखकर अति आनन्दित हुए, उनका हृदय प्रेम से प्रफुल्लित था।
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