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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 217
होहिं सुमंगल सगुन सुमन सुर बरषहिं। नगर कोलाहल भयउ नारि नर हरषहिं॥
सुन्दर मंगलमय शकुन हो रहे हैं, देवता फूल बरसाते हैं। नगर में कोलाहल हो गया, समस्त स्त्री-पुरुष आनन्दित हो रहे हैं।
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