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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 112
मुनि हँसि कहेउ जनक यह मूरति सोहइ। सुमिरत सकृत मोह मल सकल बिछोहइ॥
मुनि ने हँसकर कहा, हे जनक! यह मूर्ति जो शोभायमान हो रही है, वह एक बार स्मरण करने से भी सम्पूर्ण अज्ञानान्धकार को दूर कर देने वाली है।
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