राम सीय छबि निरुपम निरुपम सो दिनु।
सुख समाज लखि रानिन्ह आनंद छिनु छिनु॥
श्रीराम और जानकीजी की अनुपम शोभा और वह दिन भी अनुपम था। उस सुख-समाज को देखकर रानियों को क्षण-क्षण में आनन्द हो रहा था।
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