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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 154
गुन सकल सम समधी परस्पर मिलन अति आनंद लहे। जय धन्य जय जय धन्य धन्य बिलोकि सुर नर मुनि कहे ॥
सब गुणों में तुल्य दोनों समधियों ने परस्पर मिलते समय अत्यन्त आनन्द प्राप्त किया। उन्हें देखकर देवता, मनुष्य और मुनिजन धन्य-धन्य कहते और जय-जयकार कर रहे हैं।
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