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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 114
सुनि सकुचि सोचहिं जनक गुर पद बंदि रघुनंदन चले। नहिं हरष हृदय बिषाद कछु भए सगुन सुभ मंगल भले॥
यह सुनकर राजा जनक सकुचाकर सोचने लगे और (उधर) श्रीरामचन्द्रजी गुरु के चरणों को प्रणाम करके चले। इस समय उनके हृदय में हर्ष या विषाद कुछ भी नहीं था। (उनके चलते समय) बहुत-से शुभ और कल्याणसूचक अच्छे शकुन हुए।
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