जौं बिधि लोचन अतिथि करत नहिं रामहि।
तौ कोउ नृपहि न देत दोषु परिनामहि॥
यदि विधाता श्रीरामचन्द्रजी को हमारे नेत्रों का अतिथि न बनाता तो अन्त में राजा को कोई दोष न देता।
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