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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 5
रूप सील बय बंस बिरुद बल दल भले। मनहुँ पुरंदर निकर उतरि अवनिहिं चले॥
वे सुन्दरता, शील, आयु, कुल की बड़ाई, बल और सेना से सुसज्जित होकर चले, मानो इन्द्रों का यूथ ही पृथ्वी पर उतरकर जा रहा हो।
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