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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 104
एक करहिं दाप, न चाप सज्जन बचन जिमि टारें टरै। नृप नहुष ज्यों सब के बिलोकत बुद्धि बल बरबस हरै॥
कोई-कोई बड़े जोश में आते हैं, परंतु सत्पुरुषों के वचनों के समान धनुष टाले नहीं टलता। इस प्रकार राजा नहुष के समान उनके बुद्धि और बल सबके देखते-देखते बरबस क्षीण हो गये। (जब अपने पुण्य के प्रताप से राजा नहुष को इन्द्रपद प्राप्त हुआ, तब उसके मद में उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी। उन्होंने इन्द्राणी को भोगने की इच्छा प्रकट की और उसका संदेश पाकर ऋषियों को शिविका में जोड़कर चले। उनमें इस प्रकार के अनौचित्य का विचार करने की भी बुद्धि न रही। अन्त में अगस्त्य ऋषि के शाप से वे तत्काल अजगर हो गये।)
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