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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 131
प्रभुहि माल पहिराइ जानकिहि लै चलीं। सखीं मनहुँ बिधु उदय मुदित कैरव कलीं॥
श्रीरामचन्द्रजी को माला पहनाकर सखियाँ जानकीजी को लिवा चलीं; वे ऐसी प्रफुल्लित हो रही हैं जैसे चन्द्रमा का उदय होने से कुमुदिनी की कलियाँ खिल उठती हैं।
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