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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 214
राम कीन्ह परितोष रोष रिस परिहरि। चले सौंप सारंग सुफल लोचन करि॥
किंतु श्रीरामचन्द्रजी ने परशुरामजी को संतुष्ट किया और वे रोष एवं अमर्ष को त्यागकर भगवान् को धनुष सौंप अपने नेत्रों को सुफल करके चले गये।
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