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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 197
सासु उतारि आरती करहिं निछावरि। निरखि निरखि हियँ हरषहिं सूरति साँवरि॥
सासुएँ आरती उतारकर निछावर करती हैं और उनकी साँवली मूर्ति को देख-देखकर हृदय में आनन्दित होती हैं।
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