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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 224
करहिं निछावरि छिनु छिनु मंगल मुद भरीं। दूलह दुलहिनिन्ह देखि प्रेम पयनिधि परी॥
वे क्षण-क्षण में मंगल और आनन्द से भरकर उनकी निछावर करती हैं और दूल्हा-दुलहिनों को देखकर प्रेम के समुद्र में डूब गयी हैं।
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