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अध्याय 7 — सप्तम अध्याय

मनुस्मृति
229 श्लोक • केवल अनुवाद
(भृगु मुनि महर्षियों से कहते हैं कि मैं) राजा (अभिषिक्त नृपति) के आचार, उत्पत्ति और इस लोक तथा परलोक में होनेवाली उत्तम सफलता होवे ऐसे राजधर्म (दृष्टादृष्ट कर्तव्य) को कहूँगा।
शास्तरानुसार वेद को प्राप्त (उपनयन संस्कार से युक्त) क्षत्रिय (अभिषिक्त राजा) न्यायपूर्वक (अपने राज्य में रहनेवाली) सब प्रजा की रक्षा करे।
इस संसार को बिना राजा के होने पर बलवानों के डर से (प्रजाओं के) इधर-उधर भागने पर सम्पूर्ण चराचर की रक्षा के लिए भगवान्‌ ने राजा की सृष्टि की।
(ईश्वर ने) इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा और कुबेर का सारभूत नित्य अंश लेकर (राजा की सृष्टि की)।
चूँकि राजा इन्द्र आदि सब देवों के नित्य अंश से रचा गया है, इस कारण यह (राजा) से सब जीवों को अभिभूत (पराजित) करता है।
यह. राजा देखने वालों के नेत्र तथा मन को सूर्य के समान संतप्त करता है। अतः पृथ्वी पर कोई भी इसे देखने में समर्थ नहीं होता।
यह राजा प्रभाव (अपनी अधिक शक्ति) से अग्निरूप हे, वायुरूप है सूर्य रूप है, चन्द्ररूप है, धर्मराज (यम) रूप है, कुबेररूप है और चन्द्र रूप है।
(अतएव) “यह मनुष्य ही तो है” ऐसा मानकर बालक राजा का भी अपमान न करे; क्योंकि यह राजा के रूप में बड़ा देवता (दैवीशक्ति) स्थित रहता है।
(अब राजापमान का दृष्ट दोष कहते हैं-) अग्नि केवल असावधानी से स्पर्श करने वाले को ही जलाती है, किन्तु राजाग्नि (क्रुद्धराजस्वरूप अग्नि) चिरसञ्चित पशु तथा धन के सहित समस्त कुल (वंश) को ही जला देती है।
वह (राजा) प्रयोजन के अनुसार कार्य तथा शक्ति का वास्तविक विचार करे। धर्म (कार्य) सिद्धि के लिए बार-बार अनेक रूप धारण करता है।
जिस (राजा) की प्रसन्नता से लक्ष्मी, पराक्रम में विजय और क्रोध में मरण रहते हैं, अत: वह राजा सर्वतेजोमय है।
जो कोई आज्ञानवश होकर राजा के साथ द्वेष करता है, वह नि:सन्देह शीघ्रः ही नष्ट हो जाता है; क्योंकि राजा उसके विनाश के लिए मन को नियुक्त करता (चेष्टायुक्त होता) है।
अत एव वह राजा (शास्रमर्यादा के अनुसार) अपेक्षित कार्यो में जिस धर्म की व्यवस्था करता (जिस कानून को बनाता) है, उसे नहीं चाहने वालों को अनिष्ट (अनभिलषित) भी उस धर्म का उल्लंघन नहीं करना चाहिये अर्थात्‌ उस कानून को तोड़ना नहीं चाहिये।
उस (राजा) की कार्यसिद्धि के लिए भगवान ने सम्पूर्ण जीवों के रक्षक, धर्मस्वरूप पुत्र, ब्रह्मा के तेजोमय दण्ड की सृष्टि की।
उस (दण्ड) के भय से स्थावर तथा जङ्गम सभी जीव (अपने-अपने) भोग (को भोगने) के लिए समर्थ होते हैं और अपने-अपने धर्म (राजनियम) से विचलित (भरष्ट) नहीं होते हैं।
(राजा) देश, काल, दण्डशक्ति और विद्या (जिस अपराध के लिए जो दण्ड उचित हो उसका ज्ञान) का ठीक-ठीक विचारकर अन्यायवर्ती (अपराधी) व्यक्तियों में शास्रानुसार दण्ड को प्रयुक्त करे अर्थात्‌ अपराधियों को उचित दण्ड दे।
वह दण्ड ही राजा है (क्योंकि दण्ड में ही राज करने की शक्ति है) वह दण्ड पुरुष (मर्द) है (और अन्य सभी लोग उस दण्ड के विधेय) (विनय ग्रहण में शासनीय) होने से स्त्री तुल्य हैं), वह दण्ड नेता है (उस दण्ड के द्वारा ही सब कार्य यथावत्‌ प्राप्त होते हैं; अत: वह नेता-- प्राप्त करानेवाला है), वह दण्ड शासन करनेवाला है (क्योंकि दण्ड की आज्ञा से ही सब अपने-अपने कर्म में संलग्न हैं) और वह दण्ड चारों आश्रमों (६।८७) के धर्म के प्रति (जामिन्दार, मध्यस्थ मनु आदि महर्षियों के द्वारा) कहा गया है।
दण्ड ही सब प्रजाओं का शासन करता है, दण्ड ही सब (प्रजाओं) की रक्षा करता है, सबके सोते रहने पर दण्ड ही जागता है (क्योंकि उसी दण्ड के भय से चोर आदि चोरी आदि दुष्कर्म नहीं करते); विद्वान्‌ लोग दण्ड को धर्म (का हेतु) समझते हैं।
शास्तरानुसार यथावत्‌ विचार कर दिया गया दण्ड सब प्रजाओं को अनुरत करता है और बिना विचार किये धनलोभ या प्रमाद से दिया गया दण्ड सब तरफ से (धन-जन का) नाश करता है।
यदि राजा आलस्य छोड़कर दण्ड के योग्यों (अपराधियों) में दण्ड का प्रयोग नहीं करता, तो बलवान्‌ लोग दुर्बलों को, जैसे मछलियों को लोहे के छड में छेदकर पकाते हैं, वैसे पकाने लगते हैं।
(यदि राजा अपराधियों में दण्ड-प्रयोग नहीं करता, तो) कोवा पुरोडाश (यज्ञान्न) को खाने लगता, कुत्ता हविष्यान्न को चाटने लगता (अनधिकारी वेदबाह्य मूर्ख यज्ञ को दूषित करने लगते), किसी पर किसी का प्रभुत्व नहीं रह जाता (बलवान्‌ दुर्बल की सम्पत्ति छीन या लूटकर स्वयं मालिक बन बैठता) और नीच लोग ही बड़े बनने लगते हैं।
सब लोग दण्ड से जीते गये हैं (दण्ड के भय से ही नियमित होकर अपने-अपने कार्य में लगे हैं), (बिना दण्ड के) स्वभाव से ही शुद्ध मनुष्य दुर्लभ हैं दण्ड के भय से ही सम्पूर्ण संसार (अपने-अपने धनादि को) भोगने के लिए समर्थ होता है।
देव (इन्द्र, अग्नि, सूर्य, वायु आदि), दानव, गन्धर्व, राक्षस, पक्षी और सर्प (नाग) - वे भी (परमात्मा के) दण्ड के भय से पीड़ित होकर भोग (वर्षा आदि) करने के लिए प्रवृत्त होते हैं।
दण्ड के विभ्रम (अभाव या अनुचित प्रयोग) से सब वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि) दूषित (परस्री- सम्भोग से वर्णसङ्कर) हो जाँय, सब मर्यादाएँ (चतुर्वर्गफल प्राप्ति का कारणभूत नियम) छिन्न-भिन्न हो जायें और सब लोगों में (चोरी, डाका, व्यभिचार आदि से) क्षोभ उत्पन्न हो जाय।
श्याम वर्ण (शरीरवाला), लाल नेत्रोंवाला (दण्ड का स्वरूप ऐसा शास्त्रं में वर्णित है) और पापनाशक दण्ड जिस देश में विचरण करता (राजा आदि शासकों के द्वारा प्रयुक्त किया जाता है) है, उस देश में यदि नेता (राजा आदि शासक) उचित दण्ड देता है तो (वहाँ रहनेवाली) प्रजा दुःखित नहीं होती है।
(मनु आदि महर्षियों ने) उस दण्ड प्रयोग करनेवाले राजा (या अन्य राजनियुक्त शासक) को सत्यवादी, विचारकर करने वाला, बुद्धिमान्‌ और धर्म तथा अर्थ का जानकार होना बतलाया है।
उस (दण्ड) का यथायोग्य प्रयोग करता हुआ राजा (या राज-नियुक्त पुरुष) त्रिवर्ग (अर्थ, धर्म और काम) से समृद्धियुक्त होता है (और इससे विपरीत) विषयाभिलाषी, क्रोधी, क्षुद्र (नीच स्वभाव होने से विना विचार किये दण्ड प्रयोग करनेवाला) राजा दण्ड के द्वारा ही मारा जाता है (अमात्यादि प्रकृति के कोप होने पर नष्ट हो जाता है)।
अति तेजस्वी तथा असंयत आत्मावालों से दुर्धर (कठिनता से धारण करने योग्य) दण्ड धर्म से भ्रष्ट (अनुचित दण्डप्रयोग करनेवाले) राजा को बान्धव सहित नष्ट कर देता है।
फिर अर्थात्‌ सबान्धव राजा को नष्ट करने के बाद (बिना दोष का विचार किये प्रयुक्त किया गया दण्ड) किला, राज्य चराचर के सहित पृथ्वी तथा अन्तरिक्षगामी मुनियों एवं देवताओं को (यज्ञादि भाग न मिलने से) पीड़ित करता है।
असहाय, मूर्ख, लोभी, शास्र-ज्ञान-हीन और विषयों में आसक्त (राजा आदि) के द्वारा न्यायपूर्वक दण्डप्रयोग नहीं किया जा सकता है।
धनादि के विषय में शुद्ध, सत्यप्रतिज्ञ, शास्त्रानुसार व्यवहार करनेवाला, अच्छे सहायकोंवाला और बुद्धिमान्‌ (राजा आदि) के द्वारा दण्ड का प्रयोग किया जा सकता है।
अपने राज्य में न्यायानुसार दण्ड प्रयोग करे, शत्रुओं के देश में कठोर दण्ड का प्रयोग करे, स्वाभाविक मित्रों में सरल व्यवहार करे और (छोटे अपराध करने पर) ब्राह्मणों में क्षमा को धारण करे।
इस प्रकार व्यवहार न्याय से (दण्ड प्रयोग) करने वाले, शिलोज्छ (४।५ टिप्पणी) वृत्ति से भी जीविका करने वाले अर्थात्‌ ऐश्वर्यहीन भी राजा का यश पानी में तेल की बूँद के समान संसार में फैलता है।
इस (७।३ १) के प्रतिकूल दण्ड प्रयोग करनेवाले, अजितेन्द्रिय राजा का यश पानी में घी के बूँद के समान संक्षिप्त होता (घटता) है।
अपने-अपने धर्म में संलग्न सभी वर्णो और आश्रमों की रक्षा करनेवाले राजा को ब्रह्मा ने बनाया है।
(भृगु मुनि महर्षियों से कहते हैं कि-) भृत्यों (अपने अधीनस्थ, अमात्यादि) के साथ प्रजा की रक्षा करनेवाले राजा का जो-जो कर्तव्य है, वह वह क्रम से शास्त्रानुसार मैं आप लोगों से कहूँगा।
राजा (प्रतिदिन) प्रातःकाल उठकर ऋग्यजुःसाम के ज्ञाता और विद्वान् (नीतिशास्त्र के ज्ञाता) ब्राह्मणों की सेवा करे और उनके शासन में रहे (उनके कहने के अनुसार कार्य करे)।
(ज्ञान तथा तपस्या से) वृद्ध, वेदज्ञाता और शुद्ध हृदयवाले उन ब्राह्मणों की नित्य सेवा (आदर-सत्कार) करे; क्योंकि वृद्धों की सेवा करनेवाले की राक्षस (क्रूर प्रकृति वाले) भी पूजा करते हैं (फिर मनुष्यों की क्या बात है)।
उन (वृद्ध ब्राह्मणों) से पहले से विनययुक्त भी राजा सर्वदा (और अधिक) विनय सीखे; क्योंकि विनययुक्त राजा कभी नष्ट नहीं होता है।
अविनय के कारण बहुत-से राजा घोड़ा, हाथी आदि साधनों के सहित नष्ट हो गये और विनय के कारण वन में रहनेवाले (घोड़ा, हाथी आदि साधनों से रहित) भी राज्यों को पा गये (अत: विनयी होना परमावश्यक है)।
अविनय के कारण वेन, नहुष, पिजवन के पुत्र, सुदा, सुमुख और नेमि राजा नष्ट हो गये।
विनय के कारण पृथु और मनु ने राज्य, कुबेर ने धन, ऐश्वर्य और विश्वामित्र ने (क्षत्रिय होकर भी) ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया।
(राजा) त्रिवेदों के ज्ञाता विद्वानों से त्रयी विद्या, नित्य दण्डनीति विद्या, आन्वीक्षिकी विद्या और लोकव्यवहार से वार्ता विद्या को सीखे।
(राजा) इन्द्रियों को जीतने में सर्वदा प्रयत्नशील रहे; क्योंकि जितेन्द्रिय (राजा) प्रजाओं को वश में रखने के लिए समर्थ होता है।
(राजा) कामजन्य दश तथा क्रोधजन्य आठ, अन्त में दुःखदायी व्यसनों को प्रयत्नपूर्वक त्याग कर दे।
क्योंकि कामजन्य व्यसनों (७।४७) में आसक्त राजा अर्थ तथा धर्म से भ्रष्ट हो जाता है और क्रोधजन्य व्यसनों (७।४८) में आसक्त राजा आत्मा से ही भ्रष्ट (स्वयं नष्ट) हो जाता है।
मृगया (शिकार), जुआ, दिन में सोना, पराये की निन्दा, स्री में अत्यासक्ति, मद (नशा-मद्यपान आदि), नाच-गाने में अत्यासक्ति और व्यर्थ (निष्प्रयोजन) भ्रमण; ये दश कामजन्य व्यसन हैं।
चुगलखोरी, दुस्साहस, द्रोह, ईर्ष्या (दूसरे के गुण को न सहना), असूया (दूसरों के गुणों में दोष बतलाना), अर्थदोष (धनापहरण या धरोहर आदि को वापस नहीं करना), कठोर वचन और कठोरदण्ड; ये आठ क्रोधजन्य व्यसन हैं।
सब विद्वान्‌ लोग इन दोनों (कामज व्यसन-समुदाय तथा क्रोधज व्यसनसमुदाय, दे” ७।४७-४८) की जड़ जिसको जानते हैं, उस लोभ को यत्मपूर्वक जीतें अर्थात्‌ छोड़ दें; क्योंकि ये दोनों (कामजन्य तथा क्रोधजन्य व्यसन-समुदाय) उस (लोभ) से उत्पन्न होने वाले हैं।
कामजन्य व्यसन-समुदाय में (७।४७) में मद्यपान, जूआ, स्त्रिया, और शिकार (आखेट) इन चारों को क्रमश: अत्यन्त कष्टदायक जाने।
क्रोधजन्य व्यसन-समुदाय (७।४८) में दण्ड-प्रयोग, कटुवचन और अर्थदूषण (अन्याय से दूसरों की सम्पत्ति हड़प लेना); इन तीनों को क्रमशः सर्वदा अतिकष्टदायक जाने।
सम्पूर्ण राजमण्डल में रहने वाले इन सात व्यसन-समुदाय (चार कामजन्य व्यसन समुदाय-दे० ७।५० और तीन क्रोधजन्य व्यसन-समुदाय दे० ७।५१) में से पूर्व-पूर्व (अगले की अपेक्षा पहले वाले) को जितेन्द्रियपुरुष गुरुतर अधिक कष्टदायक समझे।
(व्यसन तथा मृत्यु-दोनों के कष्टकारक होने पर भी) मृत्यु को अपेक्षा व्यसन अधिक कष्टकारक है; क्योंकि मरा हुआ व्यसनी पुरुष नरकों में (एक के बाद दूसरे नरक में) जाता है और मरा हुआ व्यसन रहित पुरुष स्वर्ग में जाता है।
(राजा) वंशक्रमागत, शास्रज्ञाता, शूरवीर, निशाना मारनेवाले (शस्त्र चलाने में निपुण), उत्तम वंश में उत्पन्न और परीक्षित (शपथ ग्रहण आदि से परीक्षा किये गये) सात या आठ मन्त्रियों को नियुक्त करे।
जो कार्य सरल है, वह भी एक आदमी के लिए कठिन होता हे । विशेषकर महान्‌ फल को देनेवाला राज्य असहाय (अकेले राजा) से कैसे सुसाध्य हो सकता है? (कदापि नहीं हो सकता अतः राजा को पूर्व श्लोक में वर्णित गुणों बाले मन्तरियों को नियुक्त करना चाहिए)।
(राजा) उन मन्त्रियों के साथ में सन्धि-विग्रह (षड्गुण), स्थान, समुदय, गुप्ति और मिले हुए का उपयोग, इनका चिन्तन (सलाह-मसविरा अर्थात्‌ परामर्श) करे।
(राजा) उन (मन्त्रियों) के अभिप्राय को (एकान्त में) अलग-अलग तथा सबों के अभिप्राय को इकट्ठा जानकर अपना हितकारी कार्य करे।
राजा उन मन्त्रियों में से विद्वान्‌ धर्मादि युक्त विशिष्ट एक ब्राह्मण के साथ षड्गुण (७।१६०) से युक्त श्रेष्ठ मन्त्र (गुप्त विचार) की मन्त्रणा (विचार-विनिमय) करे।
राजा उस (विद्वान्‌ तथा धर्मात्मा ब्राह्मण) पर पूर्ण विश्वास कर (उसे) सब काम सौंप दे, तथा उसके साथ निश्चय कर बाद में कार्य का आरम्भ करे।
(राजा इसके अलावे) दूसरे भी शुद्ध (वंशपरम्परा से शुद्ध या घूस आदि न लेने से शुद्ध हदय वाले), बुद्धिमान्‌, स्थिरचित्त (आपत्ति-काल में भी नही घबड़ानेवाले या किसी के दबाव या लोभ होने पर भी राज-हित में ही दृढ रहने वाले), सब प्रकार न्यायपूर्वक धन-धान्य उत्पन्न करने वाले सुपरीक्षित मन्त्रियों को नियुक्त करे।
इस (राजा) का कार्य जितने मनुष्यों से पूरा हो; आलस्य रहित, कार्य करने में उत्साही और काम के जानकार उतने ही मनुष्यों को (मन्त्री पद पर) नियुक्त करे।
(राजा) उन (मन्त्रियो) में से शूरवीर, उत्साही, कुलीन या कुलक्रमागत, शुद्धचित्त (घूस न लेने वाले और चोरी अर्थात्‌ गवन नहीं करने वाले) मन्त्रियों को धन-धान्य के संग्रह करने में (सोने आदि के खानों तथा अन्न उत्पादक स्थानों में) और भीरु (डरने वालों) को महल (रनिवास, भोजन-गृह, शयन, गृह आदि) में नियुक्त करे।
(राजा) सभी शास्रो का विद्वान्‌; इङ्गित (वचन तथा स्वर अर्थात्‌ काकु आदि अभिप्रायसूचक भाव), आकार (क्रमशः प्रेम एवं उदासीनता का सूचक प्रसन्नता एवं उदासीनता) और चेष्टा (क्रोधादि का सूचक नेत्रों का लाल होना, भौह टेढ़ा, करना आदि) को जाननेवाले, शुद्धहृदय (राजधन को अधिक व्यय करना स्री-आसक्ति, द्यूत, मद्यपान आदि से रहित); चतुर तथा कुलीन दूत को नियुक्त करे।
अनुरक्त, शुद्ध, चतुर, स्मरणशक्ति वाला, देश और काल का जानकार, सुरूप, निर्भय और वाग्मी राजदूत श्रेष्ठ होता है।
सेनापति के अधीन दण्ड (हाथी, घोड़ा, रथ और पैदल सेना), दण्ड के अधीन विनयकार्य (सबको विनम्र-वश में रखना), राजा के अधीन कोष तथा राज्य और दूत के अधीन सन्धि और विग्रह होते हैं।
दूत ही (शत्रु से) मेल करा देता है और मिले हुए (शत्रु) से विग्रह करा देता है; दूत वह कार्य कर देता है, जिससे (मिले हुए भी) मनुष्य (परस्पर में) फूट जाते हैं।
वह (राजदूत) इस (शत्रुराजा) के कृत्यों (कर्तव्य अर्थात्‌ धन, स्त्री, पद या राज्य भाग के द्वारा राजदूतों को वश में करना आदि) में शत्रुराजा के अनुचरों के इङ्गित (अभिप्रायसूचक बात और स्वर आदि) तथा चेष्टाओं (हाथ, मुख, अंगुलि आदि को इशारे वाली) से (शत्रुराजा के) क्षुब्ध या लुब्ध भृत्यों में (शत्रुराजा के) आकार (मुख को प्रसन्नता या उदासीनता आदि), इङ्गित, चेष्टा और चिकीर्षित (अभिलषित कार्य) को मालूम करे।
शत्रु राजा के चिकीर्षित (अभिलषित कार्य) को ठीक-ठीक मालूम कर वैसा प्रयत्न करे जिससे अपने को कष्ट न हो।
(राजा) जाङ्गल, धान्य और अधिक धर्मात्माओं से युक्त आकुलतारहित, (फल-फूल, लता-वृक्षादि से) रमणीय, जहाँ आस-पास के निवासी नम्र हों, ऐसे अपनी आजीविका (सुलभ व्यापार, खेती आदि) वाले देश में निवास करे।
(राजा) धन्वदुर्ग, महीदुर्ग, जलदुर्ग, वृक्षदुर्ग, मनुष्यदुर्गं अथवा गिरिदुर्ग का आश्रयकर नगर (राजधानी) में निवास करे।
(राजा) सब प्रयत्न से गिरिदुर्ग का आश्रय करे; क्योंकि इन दुर्गो (७।७०) में से अधिक गुणयुक्त होने से गिरिदुर्ग श्रेष्ठ होता है।
इन दुर्गो (७।७०) में से पहले वाले तीन दुर्गो में (धन्वदुर्ग, महीदुर्ग और जलदुर्ग में) मृग, विलों में रहनेवाले (चूहा, खरगोश आदि) तथा जलचर (मगर आदि) और अन्त वाले तीन दुर्गो में, (वृक्षदुर्ग, मनुष्यदुर्ग और गिरिदुर्ग मे) वानर, मनुष्य तथा अमर (देव) क्रमश: निवास करें।
जिस प्रकार इन (धन्व आदि) दुर्गो में रहने वाले इन (मृग आदि) को शत्रु (व्याध आदि) नहीं मार सकते हैं, उसी प्रकार दुर्ग में निवास करने वाले राजा को शत्रु नहीं मार (जीत) सकते हैं।
(जिस कारण से) किले में रहने वाला एक धनुर्धारी (योद्धा) सौ योद्धाओं से और सो धनुर्धारी योद्धा दस हजार योद्धाओं से लड़ता है, इस कारण राजनीतिज्ञ दुर्ग की प्रशंसा करते हैं।
उस (किला) को हथियार (तलवार, धनुष आदि), धन (सुवर्ण, चाँदी आदि), धान्य (गेहूँ, चावल, चना आदि), वाहन (हाथी, घोड़ा, रथ, ऊंट: आदि), ब्राह्मणों, कारीगरों, यन्त्रों, चारा (घास, भूसा, खरी, कराई आदि) पशुओं के भोज्य पदार्थो) और जल से संयुक्त रखे।
राजा उस (किले) के बीच में (स्त्री-गृह, देव मन्दिर, अग्निशाला, स्नानागार आदि भवनों के अलग-अलग होने से) बड़ा, (खाई, परकोटा अर्थात्‌ चहारदीवारी, सेना आदि से) सुरक्षित (सब ऋतुओं में फलने-फूलनेवाले वृक्ष, गुल्म और लता आदि से युक्त होने से) सब ऋतुओं के अनुकूल, (चूना, रंग आदि से उपलिप्त होने से) शुभ्र, (वावली, पोखरा) जलाशयों तथा पेड़ों से युक्त अपना महल (राज-भवन) बनवावे।
(राजा) उस महल में निवास कर स्वजातीय, शुभलक्षणोंवाली, श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न, हृदयप्रिय तथा रूप एवं गुण से युक्त स्री से विवाह करे।
(राजा आथर्वण विधि से) पुरोहित और यज्ञ कर्म करने के लिए ऋत्विज्‌ को वरण करे तथा वे लोग (पुरोहित तथा ऋत्विक्‌) इस (राजा) के शान्तिकर्म तथा यज्ञ कर्म को करते रहें।
राजा बहुत दक्षिणा वाले (अश्वमेध, विश्वजित्‌ आदि) अनेक यज्ञों को करे और धर्म के लिए ब्राह्मणों को (स्री, गृह, शय्या, वाहन आदि) भोग- साधक पदार्थ तथा धन देवे।
(राजा) विश्वासपात्रों से वार्षिक कर वसूल करावे और लोगों से (कर लेने) में न्याययुक्त बर्ताव करे और मनुष्यों में (राजा) पिता के समान बर्ताव करे।
(राजा) उन-उन कार्यो (सेना, कोष संग्रह, दूतकार्य आदि) में अनेक प्रकार के अध्यक्षों को नियुक्त करे तथा वे अध्यक्ष इस राजा के सब कार्यो को देखा करे।
(राजा) वेदाध्ययन के बाद गुरुकुल से गृहस्थाश्रम मैं प्रविष्ट होने वाले ब्राह्मणों की पूजा (धन-धान्य-गृहादि को देकर आदर-सत्कार) करे; क्योंकि यह ब्राह्मण राजा का अक्षय निधि (खजाना) कहा गया है।
उस (सत्पात्र ब्राह्मण में दिये गये दान रूप कोष) को चोर नहीं चुराते, शत्रु नहीं छीनते और वह नष्ट नहीं होता है, अतएव राजा ब्राह्मणों में अक्षय कोष रखे (ब्राह्मणों को दान दे)।
अग्नि में हवन किये हविष्य (क्षीरान्न, घृत आदि हवनीय पदार्थ) की अपेक्षा ब्राह्मण के मुख में किया गया हवन (ब्राह्मण को दिया गया दान) न भीक नीचे गिरता है, न कभी सूखता है और न कभी नष्ट होता है (अत: अग्नि होत्रादि कर्म की अपेक्षा ब्राह्मण को दान देना श्रेष्ठ है)।
ब्राह्मणभिन्न (क्षत्रिय आदि) में दिया गया दान सामान्य फल वाला, ब्राह्मण क्रिया से रहित अपने को ब्राह्मण कहने वाले ब्राह्मण में दिया गया दान दुगुने फल वाला, विद्वान्‌ ब्राह्मण में दिया गया दान लाख गुने फल वाला और वेद-पारगामी ब्राह्मण में दिया गयां दान अनन्त फल वाला होता है।
विद्या तथा तप से युक्त पात्र की अपेक्षा से (सुपात्र को प्राप्त कर) श्रद्धा से दिये गये दान के फल को परलोक में मनुष्य प्राप्त करता है।
देश-काल के अनुसार श्रद्धा से युक्त जो द्रव्य सत्पात्र में दिया जाता है, वही धर्म का प्रसाधन (उत्तम साधन या भूषण) है।
प्रजाओं का पालन करता हुआ राजा समान, अधिक या कम (बल वाले शत्रुओं) के बुलाने (युद्ध के लिए ललकारने) पर (क्षत्रिय युद्ध से विमुख न होवे' इस) कषत्त्रिय-धर्म को स्मरण करता हुआ युद्ध से विमुख न होवे।
युद्ध से (डरकर) नहीं भागना, प्रजाओं का पालन करना और ब्राह्मणों की सेवा करना; राजाओं का अत्यन्त कल्याण करनेवाला (धर्म) माना गया है।
युद्धो में परस्पर प्रहार (चोट) करने की इच्छा करते हुए, अपार शक्ति से युद्ध करते हुए राजा विमुख न होकर (मरने से) स्वर्ग को जाते हैं।
युद्ध करता हुआ (राजा या कोई योद्धा) कूटशस्त्र (बाहर में लकड़ी आदि तथा भीतर में घातक तीक्ष्ण शस्त्र या लोहा आदि से युक्त शस्त्र); कर्णिके आकार वाला फल (बाण का अगला भाग), विषादि में बुझाये गये, अग्नि से प्रज्वलित अग्रभाग वाले शस्रो से शत्रुओं को न मारे।
(रथ पर बैठा हुआ) योद्धा भूमि पर स्थित, नपुंसक, हाथ जोड़े हुए, बाल खोले हुए, बैठे हुए और 'में तुम्हारा हूँ' ऐसा कहते हुए (शरणागत) योद्धा को न मारे।
सोये हुए, कवच से रहित, नंगा, शस्त्र से रहित, युद्ध नहीं करते हुए, (केवल युद्ध को) देखते हुए (जैसे युद्ध-संवाददाता आदि) और दूसरे के साथ युद्ध में भिड़े हुए योद्धा को न मारे।
अपने शस्र-अस्र के टूटने आदि से दु:खी, पुत्र आदि के शोक से आर्त, बहुत घायल, डरे हुए और युद्ध से विमुख योद्धा को सज्जन क्षत्रियों के धर्म का स्मरण करता हुआ (राजा या कोई भी योद्धा) न मारे।
युद्ध में डरकर विमुख जो योद्धा शत्रुओं से मारा जाता है, वह स्वामी का जो कुछ पाप है, उसे प्राप्त करता है।
डरकर युद्ध से पराङ्मुख होने पर शत्रु से अभिहत योद्धा का परलोक के लिए उपार्जित जो कुछ पुण्य है, वह सब स्वामी (उस योद्धा को वेतन देने वाला राजा आदि) प्राप्त कर लेता है।
रथ, घोड़ा, हाथी, छत्र, धन, धान्य (सब प्रकार के अन्न), पशु (गौ, भैंस आदि), खनियाँ (दासी आदि), सब तरह के द्रव्य (गुड़, नमक आदि) और कुष्य (सोना-चाँदी के अतिरिक्त अन्य ताँबा-पीतल आदि द्रव्य) को जो योद्धा जीतकर लाता है; वह उसी का होता है । (सोना, चाँदी, भूमि, रत्न आदि बहुमूल्य वस्तुएँ राजा की होती हैं)।
(युद्ध में विजय करने वाले योद्धा) 'राजा के लिए उद्धार (सोना, चाँदी जवाहरात तथा हाथी, घोड़ा! भी देवें' यह वैदिक वचन है और राजा विजयी योद्धाओं के लिए सम्मिलित रूप में जीतकर प्राप्त किये द्रव्यो में से प्रत्येक पुरुषार्थ के अनुसार विभाग देवे)।
(भृगु मुनि महर्षियों से कहते हैं कि) अनिन्दित योद्धाओं का यह सनातन धर्म (मैंने) आप लोगों से कहा, युद्ध में शत्रुओं को मारता हुआ राजा इसे न छोड़े।
(राजा) अप्राप्त (नहीं मिले हुए भूमि तथा सुवर्ण आदि) को पाने की इच्छा करे, प्राप्त (भूम्यादि) की यत्नपूर्वक रक्षा करे, रक्षा किये गये को बढ़ावे और बढ़ाये हुए (द्रव्य, भूमि आदि) को सत्पात्रों में दान कर दे।
(राजा) चार प्रकार के पुरुषार्थो का यह प्रयोजन जाने तथा आलस्यरहित होकर सर्वदा इसका पालन करे।
(राजा) अप्राप्त (नहीं मिले हुए सोना, चाँदी, भूमि, जवाहरात आदि) को दण्ड के द्वारा (शत्रु को दण्ड देकर या जीतकर) पाने की इच्छा करे, प्राप्त (मिले हुए सोना आदि उक्त) द्रव्यों की देख-भाल करते हुए (रक्षा किये गये) उनकी वृद्धि से (जलस्थल-मार्ग आदि के व्यापार आदि करके) बढ़ाये और बढ़ावे गये (उन द्रव्यों) को सत्पात्रों में दान कर दे।
(राजा) दण्ड सर्वत्र उद्यत रक्खे (हाथी, घोड़ा, रथ और पैदल-- इस प्रकार चतुरङ्गिणी सेना को सर्वदा परेड करवाकर उनका अभ्यास बढ़ाता रहे) अपने पुरुषार्थ (सैनिकादि शक्ति) को प्रदर्शित करता रहे, गुप्त रखने योग्य (अपने विचार, राजकार्य एवं चेष्टा आदि) को सर्वदा गुप्त रखे और शत्रु के छिद्र (सेना या प्रकृति के द्वेष आदि दुर्बलता) को सर्वदा देखता रहे।
सर्वदा दण्ड (चतुरङ्गिणी सेना की शक्ति) से युक्त रहनेवाले (राजा) से सब संसार डरता है। अतएव राजा सब लोगों को दण्ड द्वारा ही वश में करे।
(राजा) सर्वदा (मन्त्री आदि के साथ) निष्कपट बर्ताव करे कपट से किसी प्रकार वर्ताव न करे (कपट वर्ताव करने से राजा सबका अविश्वासपात्र हो जाता है) और स्वयं सब व्यवहार को गुप्त रखता हुआ शत्रु के कपट को (गुप्तचरो के द्वारा) मालूम करे।
(राजा ऐसा यत्न करे कि-) इस (राजा) के छिद्र (अमात्य आदि के साथ फूट) शत्रु न मालूम करे और राजा स्वयं शत्रु के छिद्र को मालूम करता रहे । कछुआ जैसे अपने अङ्गो (मुख एवं पैरों) को छिपा लेता है, वैसे ही (राजा भी) अङ्गों (स्वामी अमात्य, राष्ट्र, किला, कोष, सेना और मित्र इन सात अङ्गों') को गुप्त रखे और कदाचित्‌ आपस में कोई छिद्र (मंत्री आदि प्रकृति के फूट जाने से कोई दोष) हो जाय तो उसे दूर कर दे।
(राजा) बगुले के समान अर्थचिन्तन करे, सिंह के समान पराक्रम करे, भेड़ियों के समान शत्रु का नाश करे और खरगोश के समान (शत्रु के घेरे से) निकल जाय।
यदि वे (विजय में बाधक राजा) पहले तीन उपायों (साम, दाम और भेद) से (अपनी हरकतों को) नहीं छोड़ें तब दण्ड से ही उनको बलपूर्वक वश में करे।
पण्डित (राजनीतिज्ञ विद्वान्‌) साम आदि चारो उपायों (साम, दाम, भेद और दण्ड) में से सर्वदा राज्य की वृद्धि के लिए साम और दण्ड की प्रशंसा करते हैं।
जिस प्रकार निकीनी (सोहनी) करनेवाला (किसान खेत में से) घास को उखाड़ता है और धान्य को बचाता है, उसी प्रकार राजा राज्य की रक्षा करे और शत्रुओं का नाश करे।
जो राजा मोहवश अपने राज्य की देख-रेख न करके धनग्रहण करता है (प्रजा की रक्षा न करके भी अन्यायपूर्वक उनसे अनेक प्रकार का कर लेता है), वह शीघ्र ही राज्य से भ्रष्ट हो जाता है और बान्धव-सहित जीवन से भ्रष्ट हो जाता है (सपरिवार मर जाता है)।
जिस प्रकार शरीरधारियों के प्राण (भोजनादि के अभाव से) शरीर के क्षीण होने से नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार राज्य के पीड़ित करने से राजाओं के भी प्राण (प्रकृति-कोप आदि से) नष्ट हो जाते हैं (अत: राजा का कर्तव्य है कि यथावत्‌ राज्य की रक्षा करता रहे)।
राज्य की रक्षा के लिए राजा नित्य इन उपायों को करे; क्योंकि अच्छी तरह राज्य-रक्षा करने वाला राजा सुखपूर्वक बढ़ता (उन्नति करता) है।
(राजा) राज्य की रक्षा के लिए दो-दो, तीन-तीन या पाँच-पाँच गाँवों के समूह का एक-एक रक्षक नियुक्त करे और सौ गाँवों का एक प्रधान रक्षक नियुक्त करे।
(राजा) एक-एक, दश-दश, बीस-बीस, सौ-सौ तथा हजार-हजार गाँवों का एक-एक रक्षक नियुक्त करे।
चोर आदि के उपद्रव को शान्त करने में असमर्थ एक गाँव का रक्षक दश गाँवों के रक्षक को, दश गाँवों का रक्षक बीस गाँवों के रक्षक को
बीस गावो का रक्षक सौ गाँवों के रक्षक को और सौ गाँवों का रक्षक हजार गाँवों के रक्षक को स्वयं (बिना पूछे ही) उक्त चोर आदि के उपद्रवों को शीघ्र सूचित करे।
ग्रामवासी प्रजा राजा के लिए जो अन्न, इन्धन आदि देते हों, उसे वह एक गाँव का रक्षक लेवे।
दश गाँवों का रक्षक एक 'कुल', बीस गाँवों का रक्षक पाँच कुल, सौ गाँवों का रक्षक एक मध्यम ग्राम और हजार गाँवों का रक्षक एक मध्यम पुर (कस्बा, अपनी जीविका के लिए) राजा से प्राप्त करे।
उन ग्रामनिवासियों के ग्रामसम्बन्धी तथा अन्य (किये गये तथा नहीं किये गये) कार्यों का राजा का हितैषी दूसरा मंत्री आलसरहित होकर देखा करे।
राजा प्रत्येक नगर में (हाथी, घोड़ा, रथ एवं पैदल सैनिकों के द्वारा दूसरों में) आतङ्क उत्पन्न कराने वाले नक्षत्रों में शुक्र आदि ग्रहों के समान तेजस्वी और सब विषयों की चिन्ता (देखभाल) करने वाले एक उच्च पदाधिकारी को नियुक्त करे।
नगर में नियुक्त वह उच्चपदाधिकारी उन (ग्रामाधिपति आदि) (७।११५११६) का सर्वदा स्वयं निरीक्षण करता रहे और दूतो के द्वारा राज्यों में उन ग्रामाधिपतियों के कार्य, वर्ताव आदि व्यवहार को मालूम करता रहे।
राजा के रक्षाधिकारी प्राय: दूसरों का धन लेने वाले (घूसखोर) हुआ करते हैं, उन शठों से (राजा) इन प्रजाओं की रक्षा किया करे।
जो पापबुद्धि अधिकारी काम पड़ने वालों से (अनुचित रूप में) धन अर्थात्‌ घूस ले, राजा उनका सर्वस्व लेकर उन्हें राज्य से बाहर निकाल दे।
राजा काम में नियुक्त दास-दासियों के लिए कार्य के अनुसार प्रतिदिन का वेतन एवं स्थान निश्चित कर दे।
(राजा) साधारण कार्य (झाडू लगाना, पानी भरना आदि) करनेवाले निकृष्ट दास या दासी के लिए प्रतिदिन एक पण (एक पैसा दे० ८।१३६), ६ मास में एक जोड़ा वस्त्र, प्रतिमास एक द्रोण' (४ आढक = ८ सेर) धान्य और उत्तम दास या दासी के लिए प्रतिदिन ६ पण (पैसा) वेतन दे।
(राजा) खरीद-बिक्री, मार्ग, भोजन, मार्गादि में चोर आदि के रक्षा का व्यय, और लाभ को देख (सम्यक्‌ प्रकार से विचार) कर व्यापारी से कर लेवे।
जिस प्रकार जोक, बछड़ा और भ्रमर थोड़े-थोड़े अपने-अपने खाद्य (क्रमश: रक्त, दूध और मधु) को ग्रहण करता है; उसी प्रकार राजा को प्रजा से थोड़ा-थोड़ा वार्षिक कर ग्रहण करना चाहिये।
जिस प्रकार राजा देखभाल आदि के और व्यापारी व्यापार आदि के फल से युक्त रहे (दोनों को अपने-अपने उद्योग के अनुसार उचित फल मिले) वैसा देख (अच्छी तरह विचार) कर राजा सर्वदा निश्चयकर राज्य में कर लगावे।
राजा को पशु तथा सुवर्ण का कर (मूल धन से अधिक) का पचासवाँ भाग और धान्य का छठा, आठवाँ या बारहवाँ भाग (भूमि की श्रेष्ठता अर्थात्‌ उपजाऊपन एवं परिश्रम आदि का विचारकर) ग्रहण करना चाहिये।
वृक्ष, मांस, शहद, घी, गन्ध, औषधि, रस (नमक आदि) फूल, मूल, फल,
पत्ता, शाक, घास, चमड़ा, बाँस तथा मिट्टी के बर्तन और पत्थर की बनी सभी वस्तुओं का छठा भागकर रूप में ग्रहण करे।
मरता हुआ (अतिनिर्धन) भी राजा श्रोत्रिय (वेदपाठी ब्राह्मण) से कर न ले, इस (राजा) के देश में रहता हुआ श्रोत्रिय (जीविका न मिलने से) भूख से पीड़ित न हो (ऐसा प्रबन्ध रखे)।
जिस राजा के देश में श्रोत्रिय भूख से पीड़ित होता है, उस राजा का वह राज्य भी शीघ्र ही भूख से पीड़ित होता है (राज्य में अकाल पड़ता है)।
राजा इस (श्रोत्रिय) के शास्र (शास्र-ज्ञान) और आचरण का विचार कर धर्मयुक्त वृत्ति (जीविका) कल्पित करे और पिता जिस प्रकार अपने औरस पुत्र की रक्षा करता है, उसी प्रकार इस (श्रोत्रिय) की रक्षा करे।
राजा द्वारा सुरक्षित होता हुआ श्रोत्रिय प्रतिदिन जिस धर्म को करता है, उससे राजा की आयु, धन और राज्य की वृद्धि होती है।
राजा अपने देश में व्यवहार (शाक आदि सामान्यता वस्तुओं की खरीद-विक्री) से जीने वाले साधारण श्रेणी के लोगों से कुछ (बहुत थोड़ा) वार्षिक कर ग्रहण करे।
कारीगर, बढ़ई, लोहार आदि, बोझ आदि ढोनेवाले (मजदूर आदि) से राजा प्रति महीने में एक दिन काम करवावे (इनसे दूसरा कोई कर न लेवे)।
राजा (स्नेहादि से) अपनी जड़ को और अधिक लोभ से प्रजा की जड़ को नष्ट न करे; क्योंकि अपनी जड़ को नष्ट करता हुआ अपने को और प्रजाओं की जड़ को नष्ट करता हुआ (राजा) प्रजाओं को पीड़ित करता है।
राजा कार्य को देखकर कठोर या मृदु (सरल, दयालु) होवे; (क्योंकि समयानुसार) कठोर और मृदु राजा सबका प्रिय होता है।
(राजा कार्य की अधिकता आदि के कारण उसे देखने में) असमर्थ या थका हुआ राजा धर्मज्ञाता, विद्वान्‌, जितेन्द्रिय और कुलीन प्रधानमंत्री को प्रजाओं के कार्य को देखने के लिए नियुक्त करे।
इस प्रकार अपना सम्पूर्ण कर्तव्य करके उद्योगयुक्त और सावधान रहता हुआ (राजा) इन प्रजाओं की रक्षा करे।
मन्त्री सहित जिस राजा के देखते अर्थात्‌ राज्य करते रहने पर राज्य में चोरों (डाकू आदि) से प्रजा अपहत होती है वह राजा मरा हुआ है, जीता नहीं है (क्योंकि प्रजारक्षणरूप जीवित राजा का कार्य वह नहीं करता, अत: मरा हुआ है)।
प्रजाओं का पालन ही क्षत्रियों का श्रेष्ठ धर्म है; क्योंकि (प्रजापालन द्वारा) शास्त्रोक्त फल को भोगने वाला राजा धर्म से युक्त होता है।
(राजा) रात्रि के अन्तिम पहर में उठकर शौच (शौच, दन्तधावन एवं स्नानादि नित्यकर्म) करके अग्नि में हवन और ब्राह्मणों की पूजाकर शुभ (वास्तुलक्षण से युक्त) सभा (मंत्रणा-गृह) में प्रवेश करे।
वहाँ पर (सभाभवन में दर्शनार्थ) स्थित प्रजाओं को (यथायोग्य किसी को भाषण से, किसी को प्रियदर्शन से) संतुष्ट कर विसर्जित करे । सब प्रजाओं को विसर्जित (भेज) कर मंत्रियों के साथ मन्त्रणा (गुप्त-परामर्श) करे।
राजा पहाड़ पर चढ़कर, या एकान्त प्रासाद महल में या निर्जन वन में दूसरे से आज्ञात होते हुए (मन्त्री के साथ) मन्त्रणा (पञ्चाङ्ग: मन्त्र का विचार) करे।
जिस (राजा) के मन्त्र को दूसरे लोग आकर नहीं जानते हैं; कोश से हीन भी वह राजा सम्पूर्ण पृथ्वी का भोग करता है।
मन्त्र के समय में (राजा) जड़, मूक (गूंगे), बहरे, तिर्यग योनि में उत्पन्न (सुग्गा-तोता, मैना आदि), अत्यन्त वृद्ध, स्री, म्लेच्छ, रोगी, व्यङ्ग (कम या अधिक अङ्गवालों) को हटा दे।
क्योंकि अपमानित, जड़, मूक और बहरे तथा तिर्यग्योनि में उत्पन्न तोता मैना आदि और विशेष कर स्त्रियाँ (अस्थिर बुद्धि होने के कारण) मन्त्र का भेदन (अन्यत्र प्रकाशन) कर देती हैं, इस कारण उसमें (उन्हें हटाने में) यत्नयुक्त होवे।
मध्याह्न में या आधीरात को मानसिक खेद तथा शारीरिक खिन्नता से हीन होकर (राजा) उन (मन्त्रियों) के साथ में या अकेला ही धर्म, अर्थ और काम का चिन्तन करे।
प्रायशः परस्परविरुद्ध धर्म, अर्थ और काम में से विरोध को बचाता हुआ राजा उनकी प्राप्ति के उपाय का (अपने धर्म की वृद्धि के लिए) कन्या के दान का और अपने पुत्रों की राजनीति, विनयी बनाना आदि की शिक्षा का (चिन्तन) करे।
दूत भेजने का, बचे हुए कार्य का, अन्तःपुर (रनिवास) के प्रचार का और गुप्तचरों की चेष्टा का (चिन्तन करे)।
(राजा) आठ प्रकार के सब कर्म, पञ्चवर्ग, अनुराग, अपराग और राजमण्डल के प्रचार का वास्तविक रूप से (चिन्तन करे)।
राजा मध्यम, उदासीन और शत्रु के प्रचार तथा विजिगीषु की चेष्टा का चिन्तन (परज्ञान एवं प्रतिकार) करे।
राजमण्डल की ये चार (मध्यम, विजिगीषु, उदासीन और शत्रु) मूल प्रकृतियाँ है । इस प्रकार कुल मिलाकर राजमण्डल की बारह प्रकृतियाँ हुई।
-राजमण्डल की पूर्वोक्त (७।१५६) १२ प्रकृतियों में से प्रत्येक की- १. अमात्य (प्रधान मन्त्री), २. राष्ट्र; ३. दुर्ग (किला), ४. अर्थ (धनकोष) और ५. दण्ड ये ५ द्रव्यप्रकृतियाँ हें (अत: १२५६० द्रव्य प्रकृतियाँ होती हैं) तथा पूर्वोक्त (७।१५६) १२ प्रकृतियों को सम्मिलित कर (६०+ १२=७२) राजमण्डल की कुल ७२ प्रकृतियाँ मुनियों ने कही हैं।
विजिगीषु (अपने राज्य के पार्श्ववर्ती) तथा शत्रु की सेवा करने वाला राजा 'अरि' अरि के बाद में रहने वाला 'मित्र' और उन दोनों से भिन्न राजा 'उदासीन' होता है।
राजा अलग-अलग या मिले हुए सामादि (साम, दाम, भेद और दण्ड) उपायों से, पुरुषार्थ से और नीति से उन सबको अपने वश में करे।
सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और संश्रय - इन छः गुणों का सर्वदा विचार करे।
राजा अपनी हानि एवं लाभ को विचारकर आसन, यान, सन्धि, विग्रह तथा द्वैध एवं संश्रय करे।
राजा सन्धि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय (तथा द्वैत) इनमें प्रत्येक को दो प्रकार का जाने । (उनके प्रकार आगे कह रहे है)।
राजा अलग-अलग या मिले हुए सामादि (साम, दाम, भेद और दण्ड) उपायों से, पुरुषार्थ से और नीति से उन सबको अपने वश में करे।
सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और संश्रय इन छः गुणों का सर्वदा विचार करे।
राजा अपनी हानि एवं लाभ को विचारकर आसन, यान, सन्धि, विग्रह तथा द्वैध एवं संश्रय करे।
राजा सन्धि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय (तथा द्वैत) इनमें प्रत्येक को दो प्रकार का जाने । (उनके प्रकार आगे कह रहे हैं)।
(१) समानकर्मा सन्धि और असमानकर्मा सन्धि । तात्कालिक या भविष्य के लाभ की इच्छा से किसी दूसरे राजा से मिलकर यान (शत्रु पर चढ़ाई) करना समानधर्मा नामक सन्धि है, तथा (२) तात्कालिक या भविष्य में लाभ की इच्छा से किसी राजा से आप इधर जाइये, में इधर जाता हूँ” ऐसा कहकर पृथक्‌पृथक्‌ यान (शत्रु पर चढ़ाई) करना, 'असमानधर्मा' नामक सन्धि है।
(१) शत्रु पर विजय पाने के लिए.शत्रुव्यसन (मन्त्री या सेनापति आदि से विरोध) मालूम कर समय (७।१८० में कथित अगहन मास आदि) के अलावे असमय में भी अथवा समय (अगहन मास आदि) में स्वयं किया गया विग्रह प्रथम भेद है तथा (२) दूसरे किसी राजा के द्वारा अपने मित्र पर आक्रमण या उसकी किसी प्रकार हानि पहुँचाने पर मित्र की रक्षा के लिए किया गया विग्रह द्वितीय भेद है।
यान के दो भेद होते हैं शत्रु के आपत्ति में फैंस जाने पर अकस्मात्‌ (एका-एक) समर्थ राजा का आक्रमण करना प्रथम “यान” है तथा स्वयं समर्थ न होने पर मित्र के साथ आक्रमण करना द्वितीय “यान' है।
आसन के दो भेद हैं - भाग्यवश या पूर्वजन्म के कार्यवश सेना, कोष आदि के क्षीण हो जाने पर या समृद्ध रहने पर भी राजा का घेरे पड़े रहना प्रथम 'आसन' है तथा मित्र के अनुरोध से उसकी रक्षा के लिए शत्रु का घेरे पड़े रहना द्वितीय 'आसन' है।
षाड्गुण्य (७।१६० में कथित-- सन्धि आदि के उपयोग अर्थात्‌ लाभ) को जानने वाले द्वैध के दो भेद कहते हैं - अपने कार्य की सिद्धि के लिए हाथी-घोड़ा आदि चतुरंगिणी सेना का एक भाग शत्रु से बचने के लिए सेनापति के अधीन करना प्रथम द्वैध तथा उक्त सेना का शेष भाग किला आदि में राजा के अधीन रखना द्वितीय द्वेध है।
संश्रय दो प्रकार का होता है - शत्रु से पीडित होते हुए आत्मरक्षार्थ किसी बलवान्‌ राजा का आश्रय लेना प्रथम 'संश्रय' तथा भविष्य में शत्रु से पीडित होने की आशंका से आत्मरक्षार्थ किसी बलवान्‌ राजा का आश्रय लेना द्वितीय 'संश्रय' है।
जब राजा भविष्य में अपनी (सेना आदि की) निश्चित रूप से अधिकता तथा वर्तमान सामान्य हानि देखे तो शत्रु से सन्धि (मेल, सुलह) कर ले।
जब राजा सब प्रकृतियों (७।१५६-१५७) को (दान-मान आदि से) अत्यन्त सन्तुष्ट तथा अपनी सेना को बलशालिनी समझे तो शत्रु को लक्ष्य कर अभियान (युद्ध के लिए यात्रा) कर दे।
जब राजा अपनी सेना आदि को हृष्ट-पुष्ट (बलवती) तथा शत्रु की सेना आदि को इसके विपरीत (दुर्बल) समझे तब उस पर चढ़ाई कर दे।
जब राजा हाथी आदि वाहनों (सवारियों) से तथा अमात्य आदि शक्तियों से अपने को अत्यन्त क्षीण (दुर्बल) समझे तब यत्नपूर्वक शत्रु को शान्त करता हुआ चुप होकर बैठ जावे।
जब राजा शत्रु को सब प्रकार (अपने से) बलवान्‌ समझे तब अपनी सेना को दो भागों में विभक्त कर (एक भाग को शत्रु को रोकने के लिए सेनापति के अधीन कर) तथा दूसरे भाग को आत्मरक्षार्थ अपने अधीन (किला आदि सुरक्षित स्थान में रखकर) अपना कार्य (मित्र आदि सहायक साधनों का संग्रह) करे।
जब राजा (अमात्यादि के दोष से पूर्व श्लोकानुसार सेना को दो भागों में विभक्त कर आत्मरक्षा का उपाय करने पर भी) शत्रु द्वारा अपने को पराजित होने योग्य समझे, तब शीघ्र ही बलवान्‌ (अग्रिम श्लोकोक्त गुणयुक्त) राजा का आश्रय करे।
जो राजा (बिगड़ी हुई अमात्य आदि ७।१५६-१५७) प्रकृतियों तथा शत्रु की सेना का निग्रह करे (दण्डित करे) उस राजा की सेवा (दुर्बल राजा) करे।
जब राजा उक्त प्रकार से (७।१७४-१७५) संश्रय करने पर भी दोष, अपनी कार्य सिद्धि का अभाव) देखे; तब निर्भय होकर उस (दुर्बल) अवस्था में भी पूरी शक्ति के साथ युद्ध करे।
राजा सब उपायों (साम, दाम, दण्ड और भेद) से ऐसा करे कि जिससे इसके शत्रु, मित्र तथा उदासीन अधिक न होवें।
राजा उत्तरकाल (आगे वाले समय) वर्तमान काल और अतीत काल के गुणदोषों का चिन्तन करे।
भविष्य काल के कार्या के गुण-दोषों को जानने वाला, वर्तमान काल के कार्यो के विषय में शीघ्र निश्चय करने वाला और बीते हुए कार्यशेष को जाननेवाला राजा शत्रुओं से पराजित नहीं होता है।
शत्रु, मित्र या उदासीन राजा जिस कार्य को करने से उस राजा को पीड़ित (पराजित) न करें, संक्षेप में यही राजनीति है।
जब राजा शत्रु पर अभियान (चढ़ाई) करे, तब इस (आगे कहे हुए) विधि से धीरे-धीरे शत्रु के नगर की ओर बढ़े।
राजा शुभ मार्गशीर्ष (अगहन) मास में या फाल्गुन अथवा चैत्र मास में अपनी सेना के अनुसार शत्रु के नगर की ओर बढ़े।
दूसरे समय भी जब राजा अपनी विजय निश्चित समझे अपने सैन्यबल से युक्त हो; तब विग्रहकर शत्रु पर चढ़ाई करे और जब शत्रु को अमात्य आदि के विरोध (फूट-बैर) या कठोर दण्ड आदि से व्यसन में पड़ा हुआ समझे तब भी (ग्रीष्म आदि) अन्य समय में शत्रु पर चढ़ाई करे।
अपने किला तथा देश की रक्षा के लिए प्रधान पुरुष से युक्त सेना का एक भाग रखकर; यात्रा के योग्य शास्त्रोक्त सवारी, शस्त्र, कवच आदि से युक्त होकर; दूसरे राजा के राज्य में जाने पर मार्ग तथा स्थिति पाने के लिए उनके भृत्य आदि को अपने पक्ष में करके;
कपटवेशधारी गुप्तचरों को शत्रु-देश की प्रत्येक बात मालूम करने के लिए भेजकर; जाङ्गल, आनूप तथा आट्विक भेद के तीन प्रकार के मार्गो को पेड़, लता, झाड़ी, कंटक आदि कटवाने तथा नीची ऊँची भूमि को बराबर कराने से गमन के योग्य बनाकर और हाथी, घोड़ा, रथ, पैदल, सेना एवं कार्यकर्तारूप छ: प्रकार से बल (सेना) को उचित भोजन-वस्त्र, मान-सत्कार एवं औषध आदि से शुद्ध कर यात्रा के योग्य विधान से धीरे-धीरे शत्रु के देश को प्रस्थान करे।
गुप्तरूप से शत्रु की ओर मिले हुए मित्र में और पहले विरक्त होकर फिर आये हुए व्यक्ति (सैनिक या गुप्तचर आदि) में अत्यन्त सावधानी रखे, क्योंकि वे अत्यन्त कष्टकर (अतएव दुर्निग्रह) शत्रु हैं।
(राजा मार्ग में भय रहने पर) दण्डव्यूह से या शकटव्यूह से या बराहव्यूह से या मकरव्यूह से या सूचीव्यूह से अथवा गरुडव्यूह से मार्ग में चले।
(राजा) जिधर से भय की आशङ्का हो, उधर ही सेना का विस्तार करे और स्वयं सर्वदा “पद्मव्यूह’ से (नगर से निकलकर कपटपूर्वक) शत्रुदेश में प्रवेश करे।
(राजा) सेनापति तथा बलाध्यक्ष को सब दिशाओं में फैलाकर नियुक्त करे तथा जिस दिशा की ओर से भय की आशङ्का हो, उस दिशा को पूर्व दिशा मान कर आगे उसी दिशा को करे।
(राजा) ठगने, भागने या युद्ध करने के लिए विश्वासपात्र, शंख, भेरी, नगाड़ा आदि वाद्यों के सांकेतित; रुकने में तथा युद्ध में, चतुर, निडर और कभी विकृत नहीं होनेवाले सेना के एक भाग को चारों तरफ दूर तक शत्रु के प्रवेश को रोकने तथा उसकी चेष्टा को मालूम करते रहने के लिए नियुक्त करे।
(राजा) थोड़े योद्धा हों तो उन्हें थोड़ी दूर में ही संगठित कर तथा अधिक योद्धा हों तो उन्हें दूर तक फैलाकर सूचीव्यूह (७।१८७ का निष्कर्ष) या 'वज्रव्यूह' से मोर्चाबन्दी कर युद्ध करावे।
(राजा) समतल युद्धभूमि में रथ और घोड़ों से, जलप्राय युद्धभूमि में नाव तथा हाथियों से, पेड़ तथा झाड़ियों से गहन युद्धभूमि में धनुषों से और कंटक पत्थर आदि से वर्जित युद्धभूमि में ढाल, तलवार एवं भाला-बर्छा आदि से युद्ध करे।
(राजा) कुरुक्षेत्र, मत्स्य, (विराट), पाञ्चाल (कान्यकुब्ज तथा अहिच्छत्र) और शूरसेन (मथुरा) देश में उत्पन्न लम्बे कद वाले योद्धाओ को तथा अन्य देशोत्पन्न लम्बे या छोटे कदवाले युद्धाभिमानी योद्धाओं को युद्ध के आगे वाले मोर्चे पर नियुक्त करे।
(राजा) मोर्चा बनाकर सैनिकों को उत्साहित करे, उनकी अच्छी तरह जाँच करे तथा शत्रुओं से लड़ते हुए उनकी चेष्टाओं को मालूम करता रहे।
(राजा दुर्ग के बाहर स्थित) शत्रु पर घेरा डालकर रहे, इसके देश को (लूटपाट आदि से) पडित करे और इसके भूसा, घास, अन्न, जल, और ईधन को सर्वदा नष्ट करे अर्थात्‌ दूषित द्रव्य (विष आदि) मिलाकर उपयोग के अयोग्य बना दे।
(राजा) शत्रु के उपजीव्य तडाग, नहर, कूप आदि को नष्ट कर दे; किले या नगर के परकोटे (चहारदिवारी) को तोड़ दे, खाई को मिट्टी आदि से भरकर सुखा दे (सुप्रवेश्य कर दे) इस प्रकार निर्भय होकर शत्रु को दबा दे तथा रात में नगाड़ा आदि युद्ध के बाजाओं को बजवाकर शत्रु को भयभीत करता रहे।
(राजा) राज्याभिलाषी तथा भेद योग्य, शत्रु के दायादो को या मन्त्री सेनापति आदि प्रकृति को फोड़े (विजय होने पर राज्य आदि का लोभ देकर अपने पक्ष में करे), उस (शत्रु) के द्वारा किये ऐसे कार्य (भेद) को स्वयं मालूम करे और विजयाभिलाषी राजा निर्भय होकर शुभ मुहूर्त में शत्रु से युद्ध करे।
(राजा) साम (प्रेम-प्रदर्शन), दान, भेद (शत्रु के राज्यार्थी दायाद या मन्त्री आदि को विजय होने पर राज्य आदि का लोभ देकर अपने पक्ष में करना) इन तीनों उपायों से अथवा इनमें से किसी एक या दो उपायों से शत्रुओं को जीतने का प्रयत्न करे। (पहले) युद्ध से जीतने की कदापि चेष्टा न करे।
क्योंकि युद्ध करते हुए दो पक्षों की विजय तथा पराजय युद्ध में अनिश्चित रहती है, इस कारण युद्ध का त्याग करे।
(राजा) पूर्वोक्त तीनों (साम, दान और भेद) उपायों के साधक न होने पर ही सैन्यादि-शक्ति से संयुक्त होकर वैसा युद्ध करे, जिससे शत्रुओं को जीत लें। (क्योंकि विजय होने से राज्यलाभ तथा युद्ध में सामने मरने पर स्वर्गलाभ होता है । किंतु यदि निश्चित रूप से पराजय की सम्भावना हो तो युद्ध त्यागकर आत्मरक्षा करनी चाहिये वहाँ से हट जाना चाहिये, क्योंकि मरने पर मनुष्य कोई कार्यसाधन नहीं कर सकता, जिससे वह सुखी हो। इसी कारण मनु भगवान्‌ ने आगे (७।२१३) आत्मरक्षा करने पर जोर दिया है)।
विजय लाभ कर देवताओं तथा धार्मिक ब्राह्मणों को गो, भूमि तथा सुवर्ण आदि दान देकर पूजा करे । जीती गयी वस्तुओं में-से इतना अंश देवताओं तथा ब्राह्मणों के लिए मैंने दान दिया” ऐसा वहाँ के निवासियों में घोषणा करे तथा “राजभक्ति में जिन लोगों ने अपने राजा का पक्ष लेकर मेरे विरुद्ध आचरण किया है उन्हें भी मैं अभयदान देता हूँ” (वे निर्भय होकर अपने-कार्यो को करें) ऐसी भी घोषणा करे।
उस शत्रु राजा तथा मन्त्री एवं प्रजा के मुख्य लोगों की अभिलाषा को मालूम कर उसी वंश में उत्पन्न व्यक्ति को उस राज्य में पुन: अभिषिक्त करे और उसके साथ समय-क्रिया (शर्तनामा अमुक-अमुक कार्य तुम्हें स्वेच्छानुसार करना होगा तथा अमुक-अमुक कार्य मेरी आज्ञा से करना होगा इत्यादि) करे।
विजयी राजा उन (जीते हुए देश के निवासियों) के धार्मिक कार्यो को प्रमाणित करे (उन्हें पूर्ववत्‌ चालू करे) और मन्त्री आदि मुख्य लोगों के साथ उस नवाभिषिक्त राजा को रत्न आदि भेंट देकर सत्कृत करे।
(क्योंकि यद्यपि किसी की अतिप्रिय वस्तुओं को ले लेना अप्रिय तथा दे देना प्रिय होता है, तथापि विशेष अवसरों पर ले लेना तथा दे देना - ये दोनों ही कार्य श्रेष्ठ होते हैं (अत: नये राजा के लिए रत्नादि का उपहार देना ही श्रेष्ठ है)।
इस संसार में जो कुछ कार्य हैं, वे सब भाग्य तथा मनुष्य के अधीन हैं; उनमें दैव (पूर्वजन्मकृत) कार्य अचिन्त्य हैं (कब क्या होने वाला है, इसे कोई नहीं जानता) और मानुष (मनुष्य सम्बन्धी अर्थात्‌ वर्तमान में किया जाने वाला) कार्य में पर्यालोचन है (अतएव मनुष्य को स्व-कार्य-सिद्धि के लिए यत्न करते रहना चाहिये)।
(विजिगीषु राजा पूर्वोक्त प्रकार से युद्ध करे) अथवा उसके साथ मित्रता कर उस शत्रु राजा द्वारा दिये गये सुवर्ण (रत्नादि सम्पत्ति) तथा राज्य की एक भाग भूमि-- इन तीन (मित्र, सुवर्ण तथा भूमि) को युद्ध यात्रा का फल मानकर यत्नपूर्वक उस राजा के साथ सन्धि करे।
(विजिगीषु राजा) पार्ष्णिग्राह तथा आक्रन्द राजा का अपने मण्डल में ध्यान कर यात्रा करे और मित्र (सन्धि किया हुआ शत्रु) या अमित्र (हारा हुआ शत्रु) राजा से यात्रा का फल (मित्रता, सुवर्ण तथा भूमि) को अवश्य लेवे।
राजा मित्र तथा राज्य की प्राप्ति वैसी उन्नति नहीं करता, जैसी वर्तमान में दुर्बल होने पर भी भविष्य में उन्नति करने वाले स्थायी मित्र की प्राप्ति से (उन्नति) करता है।
धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सन्तुष्ट अमात्य आदि प्रकृतिवाला, अनुरक्त, स्थिर कार्यारम्भ करने वाला छोटा भी मित्र श्रेष्ठ होता है।
विद्वान्‌, कुलीन, शूरवीर, चतुर, दानी, कृतज्ञ और (सुख-दुःख में) धैर्ययुक्त शत्रु को विद्वान्‌ लोग कष्टसाध्य (कठिनता से जीतने योग्य) कहते हैं । (अतएव ऐसे शत्रु से सन्धि कर लेना चाहिये)।
सज्जनता, मनुष्यों की पहचान करना, शूरता, कृपालुता और सर्वदा बहुत दान देना— ये सब उदासीन राजा के गुण हैं । (अतएव इस प्रकार के उदासीन राजा का आश्रय कर पूर्वोक्त) (२।२१०) लक्षण वाले शत्रु से भी युद्ध करना चाहिये।
(नीरोगता आदि गुणों से युक्त होने के कारण) कल्याणप्रद, (नदी, नहर, तडागादि होने से वृष्टि का अभाव होने पर भी) धान्य उत्पादन करनेवाली (अधिक घास आदि होने से) पशुओं की वृद्धि में सहायक भूमि को राजा आत्मरक्षा के लिए बिना विचार किये छोड़ दे।
आपत्ति के लिए धन की रक्षा करे, धनों के द्वारा स्रियो की रक्षा करे और धन तथा खियों के द्वारा सर्वदा अपनी रक्षा करे (यह सर्व-सामान्य माना गया हैं)।
सब आपत्तियों (कोषक्षय, अमात्यादि प्रकृतिकोप तथा मित्रादिव्यसन प्रभृति) को अधिक मात्रा में एक साथ उपस्थित जानकर विद्वान्‌ राजा (घबड़ाये नहीं, किन्तु) सम्मिलित या पृथक्‌-पृथक्‌ सब उपायों (साम, दान, दण्ड और भेद) को काम में लावे।
(राजा) उपेता (प्राप्तिकर्ता अर्थात्‌ अपने), उपेय (प्राप्ति करने योग्य अर्थात्‌ शत्रु) तथा परिपूर्ण सामादि सब उपाय - इन तीनों को अवलम्बन कर प्रयोजन की सिद्धि के लिए प्रयत्न करे।
राजा इस प्रकार इन सब विषयों को मन्त्रियों के साथ में विचार (गुप्त परामर्श) कर (मुद्गर या अन्य शस्त्र आदि के अभ्यास से) व्यायाम कर दोपहर को स्नान (तथा मध्याह्रकृत्य-सन्ध्योपासनादि नित्यकर्म से निवृत्त हो) कर भोजन करने के लिए अन्तःपुर (रनिवास) में प्रवेश करे।
वहाँ (अन्तःपुर में) अपने तुल्य, भोजन-समय के ज्ञाता, किसी शत्रु आदि से फोड़कर अपने पक्ष में नहीं करने योग्य परिचारकों (पाचक आदि) से बनाये गये एवं परीक्षा किये गये अन्न आदि (भोज्य, पेय, लेह्य, चोष्य आदि पदार्थ) को विषनाशक मन्त्रं से (गारुडादि मंत्रों को जपकर) भोजन करे।
राजा विषनाशक औषधियों से (खाने के लिए दिये गये) सब अन्न को संयुक्त करे तथा सावधान रहते हुए विषनाशक (गरुडादि) रत्नों को सर्वदा धारण करे।
(गुप्तचरों के द्वारा) परीक्षित, (गुप्त शस्त्र रखने तथा विष-लिप्त भूषण आदि धारण करने की आशङ्का से) नियत वेष तथा भूषणों से अच्छी तरह शुद्ध (दोषरहित) स्त्रियाँ (परिचारिकायें अर्थात्‌ दासियाँ) चामर आदि से हवा करने, स्नान तथा पीने के लिए पानी देने और सुगन्धित धूप आदि करने से राजा की सेवा करे।
राजा (अपने) यान (सवारी अर्थात्‌ रथ, अश्व, गज आदि), शय्या (पलँग या शयनगृह); आसन (बैठने के सिंहासन या अन्य चौकी आदि), अशन (भोजन); स्नान, प्रसाधन (तेल आदि का मर्दन या चन्दन आदि का) लेपन और सब प्रकार के भूषणों के धारण करने में इसी प्रकार अच्छी तरह परीक्षा कर उन्हें अपने व्यवहार में लाने का प्रबन्ध करे।
भोजन कर राजा रनिवास में रानियों के साथ विहार (क्रीडा) आदि करे तथा यथासमय (दिन के सप्तम भाग में विहारकर) फिर (दिन के अष्टम भाग में) राजकार्यो का चिन्तन करे।
अलङ्कार आदि पहना हुआ राजा फिर शस्त्रधारी सैनिकों, हाथी-घोड़ा आदि वाहनों, खड्ग, तोमर, कुन्तादि सब अस्न-शस्रों और भूषणों का निरीक्षण करे।
(फिर राजा) सायङ्काल का सन्ध्योपासन करके दूसरी कक्षा (ड्योढ़ी) के भीतर एकान्त स्थान में स्वयं शस्त्र को धारणकर गुप्त समाचारों को बतलाने वाले गुप्तचरों के कामों को सुने और उसके बाद उन्हें विदाकर परिचारिकाओं (दासियों) से परिवृत होकर भोजन के लिए फिर अन्तःपुर में प्रवेश करे।
वहाँ (रनिवास) में बाजाओं के शब्दों से प्रहर्षित होकर कुछ भोजनकर यथासमय सो जावे और श्रमरहित होकर शेष रात्रि में उठ (जग) जावे।
निरोग राजा इन सब कार्यो को स्वयं करे तथा जब अस्वस्थ हो तब इन सब कार्यो को मुख्य मन्त्रियो (उत्तरदायित्व) पर सौंपे।
Krishjan
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