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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 63
दूतं चैव प्रकुर्वीत सर्वशास्त्रविशारदम्‌ । इङ्गिताकारचेष्टज्ञ शुचिं दक्षं कुलोद्रतम्‌ ।।
(राजा) सभी शास्रो का विद्वान्‌; इङ्गित (वचन तथा स्वर अर्थात्‌ काकु आदि अभिप्रायसूचक भाव), आकार (क्रमशः प्रेम एवं उदासीनता का सूचक प्रसन्नता एवं उदासीनता) और चेष्टा (क्रोधादि का सूचक नेत्रों का लाल होना, भौह टेढ़ा, करना आदि) को जाननेवाले, शुद्धहृदय (राजधन को अधिक व्यय करना स्री-आसक्ति, द्यूत, मद्यपान आदि से रहित); चतुर तथा कुलीन दूत को नियुक्त करे।
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