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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 66
दूत एव हि संधत्ते भिनत्त्येव च संहतान्‌ । दूतस्तत्कुरुते कर्म भिद्यन्ते येन मानवाः ।।
दूत ही (शत्रु से) मेल करा देता है और मिले हुए (शत्रु) से विग्रह करा देता है; दूत वह कार्य कर देता है, जिससे (मिले हुए भी) मनुष्य (परस्पर में) फूट जाते हैं।
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