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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 200
भिन्द्याच्चैव तडागानि प्राकारपरिखास्तथा । समवस्कंदयेच्चैनं रात्रौ वित्रासयेत्तथा ।।
(राजा) शत्रु के उपजीव्य तडाग, नहर, कूप आदि को नष्ट कर दे; किले या नगर के परकोटे (चहारदिवारी) को तोड़ दे, खाई को मिट्टी आदि से भरकर सुखा दे (सुप्रवेश्य कर दे) इस प्रकार निर्भय होकर शत्रु को दबा दे तथा रात में नगाड़ा आदि युद्ध के बाजाओं को बजवाकर शत्रु को भयभीत करता रहे।
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