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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 189
संशोध्य त्रिविधं मार्ग षड्विधं च बलं स्वकम्‌ । सांपरायिककल्पेन यायादरिपुरं प्रति ।।
कपटवेशधारी गुप्तचरों को शत्रु-देश की प्रत्येक बात मालूम करने के लिए भेजकर; जाङ्गल, आनूप तथा आट्विक भेद के तीन प्रकार के मार्गो को पेड़, लता, झाड़ी, कंटक आदि कटवाने तथा नीची ऊँची भूमि को बराबर कराने से गमन के योग्य बनाकर और हाथी, घोड़ा, रथ, पैदल, सेना एवं कार्यकर्तारूप छ: प्रकार से बल (सेना) को उचित भोजन-वस्त्र, मान-सत्कार एवं औषध आदि से शुद्ध कर यात्रा के योग्य विधान से धीरे-धीरे शत्रु के देश को प्रस्थान करे।
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