श्रुतवृत्ते विदित्वाऽस्य वृत्तिं धर्म्या प्रकल्पयेत् ।
संरक्षेत्सर्वतश्चैनं पिता पुत्रमिवौरसम् ।।
राजा इस (श्रोत्रिय) के शास्र (शास्र-ज्ञान) और आचरण का विचार कर धर्मयुक्त वृत्ति (जीविका) कल्पित करे और पिता जिस प्रकार अपने औरस पुत्र की रक्षा करता है, उसी प्रकार इस (श्रोत्रिय) की रक्षा करे।
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