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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 102
अलब्धमिच्छेइण्डेन लब्धं रक्षेदवेक्षया । रक्षितं वर्धयेद्वृदध्या वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत्‌ ।।
(राजा) अप्राप्त (नहीं मिले हुए सोना, चाँदी, भूमि, जवाहरात आदि) को दण्ड के द्वारा (शत्रु को दण्ड देकर या जीतकर) पाने की इच्छा करे, प्राप्त (मिले हुए सोना आदि उक्त) द्रव्यों की देख-भाल करते हुए (रक्षा किये गये) उनकी वृद्धि से (जलस्थल-मार्ग आदि के व्यापार आदि करके) बढ़ाये और बढ़ावे गये (उन द्रव्यों) को सत्पात्रों में दान कर दे।
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