परस्परविरुद्धानां तेषां च समुपार्जनम् ।
कन्यानां सम्प्रदानं च कुमाराणां च रक्षणम् ।।
प्रायशः परस्परविरुद्ध धर्म, अर्थ और काम में से विरोध को बचाता हुआ राजा उनकी प्राप्ति के उपाय का (अपने धर्म की वृद्धि के लिए) कन्या के दान का और अपने पुत्रों की राजनीति, विनयी बनाना आदि की शिक्षा का (चिन्तन) करे।
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