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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 46
कामजेषु प्रसक्तो हि व्यसनेषु महीपतिः । वियुज्यतेऽर्थधर्माभ्यां क्रोधजेष्वात्मनैव तु ।।
क्योंकि कामजन्य व्यसनों (७।४७) में आसक्त राजा अर्थ तथा धर्म से भ्रष्ट हो जाता है और क्रोधजन्य व्यसनों (७।४८) में आसक्त राजा आत्मा से ही भ्रष्ट (स्वयं नष्ट) हो जाता है।
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