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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 51
दंडस्य पातनं चैव वाक्पारुष्यार्थदूषणे । क्रोधजेऽपि गणे विद्यात्कष्टमेतत्त्रिकं सदा ।।
क्रोधजन्य व्यसन-समुदाय (७।४८) में दण्ड-प्रयोग, कटुवचन और अर्थदूषण (अन्याय से दूसरों की सम्पत्ति हड़प लेना); इन तीनों को क्रमशः सर्वदा अतिकष्टदायक जाने।
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