दंडस्य पातनं चैव वाक्पारुष्यार्थदूषणे ।
क्रोधजेऽपि गणे विद्यात्कष्टमेतत्त्रिकं सदा ।।
क्रोधजन्य व्यसन-समुदाय (७।४८) में दण्ड-प्रयोग, कटुवचन और अर्थदूषण (अन्याय से दूसरों की सम्पत्ति हड़प लेना); इन तीनों को क्रमशः सर्वदा अतिकष्टदायक जाने।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।