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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 190
शत्रुसेविनि मित्रे च गूढे युक्ततरो भवेत्‌ । गतप्रत्यागते चैव स हि कष्टतरो रिपुः ।।
गुप्तरूप से शत्रु की ओर मिले हुए मित्र में और पहले विरक्त होकर फिर आये हुए व्यक्ति (सैनिक या गुप्तचर आदि) में अत्यन्त सावधानी रखे, क्योंकि वे अत्यन्त कष्टकर (अतएव दुर्निग्रह) शत्रु हैं।
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