आदानमप्रियकरं दानं च प्रियकारकम् ।
अभीप्सितानामर्थानां कालयुक्तं प्रशस्यते ।।
(क्योंकि यद्यपि किसी की अतिप्रिय वस्तुओं को ले लेना अप्रिय तथा दे देना प्रिय होता है, तथापि विशेष अवसरों पर ले लेना तथा दे देना - ये दोनों ही कार्य श्रेष्ठ होते हैं (अत: नये राजा के लिए रत्नादि का उपहार देना ही श्रेष्ठ है)।
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