आसनं चैव यानं च सन्धिं विग्रहमेव च ।
कार्य वीक्ष्य प्रयुञ्जीत द्वैधं संश्रयमेव च ।।
राजा अपनी हानि एवं लाभ को विचारकर आसन, यान, सन्धि, विग्रह तथा द्वैध एवं संश्रय करे।
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