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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 106
नास्य छिद्रं परो विद्याद्धिद्याच्छिद्रं परस्य च । गूहेत्कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद्विक्रमात्मनः ।।
(राजा ऐसा यत्न करे कि-) इस (राजा) के छिद्र (अमात्य आदि के साथ फूट) शत्रु न मालूम करे और राजा स्वयं शत्रु के छिद्र को मालूम करता रहे । कछुआ जैसे अपने अङ्गो (मुख एवं पैरों) को छिपा लेता है, वैसे ही (राजा भी) अङ्गों (स्वामी अमात्य, राष्ट्र, किला, कोष, सेना और मित्र इन सात अङ्गों') को गुप्त रखे और कदाचित्‌ आपस में कोई छिद्र (मंत्री आदि प्रकृति के फूट जाने से कोई दोष) हो जाय तो उसे दूर कर दे।
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