स्वयकृतश्च कार्यार्थमकाले काल एव वा ।
मित्रस्य चैवापकृते द्विविधो विग्रहः स्मृतः ।।
(१) शत्रु पर विजय पाने के लिए.शत्रुव्यसन (मन्त्री या सेनापति आदि से विरोध) मालूम कर समय (७।१८० में कथित अगहन मास आदि) के अलावे असमय में भी अथवा समय (अगहन मास आदि) में स्वयं किया गया विग्रह प्रथम भेद है तथा (२) दूसरे किसी राजा के द्वारा अपने मित्र पर आक्रमण या उसकी किसी प्रकार हानि पहुँचाने पर मित्र की रक्षा के लिए किया गया विग्रह द्वितीय भेद है।
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