षाड्गुण्य (७।१६० में कथित-- सन्धि आदि के उपयोग अर्थात् लाभ) को जानने वाले द्वैध के दो भेद कहते हैं - अपने कार्य की सिद्धि के लिए हाथी-घोड़ा आदि चतुरंगिणी सेना का एक भाग शत्रु से बचने के लिए सेनापति के अधीन करना प्रथम द्वैध तथा उक्त सेना का शेष भाग किला आदि में राजा के अधीन रखना द्वितीय द्वेध है।
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