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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 171
बलस्य स्वामिनश्चैव स्थितिः कार्यार्थसिद्धये । द्विविधं कीर्त्यते द्वैधं षाङ्गण्यगुणवेदिभिः ।।
षाड्गुण्य (७।१६० में कथित-- सन्धि आदि के उपयोग अर्थात्‌ लाभ) को जानने वाले द्वैध के दो भेद कहते हैं - अपने कार्य की सिद्धि के लिए हाथी-घोड़ा आदि चतुरंगिणी सेना का एक भाग शत्रु से बचने के लिए सेनापति के अधीन करना प्रथम द्वैध तथा उक्त सेना का शेष भाग किला आदि में राजा के अधीन रखना द्वितीय द्वेध है।
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