कार्य सोऽवेक्ष्य शक्तिं च देशकालौ च तत्त्वतः ।
कुरुते धर्मसिद्ध्यर्थं विश्वरूपं पुनः पुनः ।।
वह (राजा) प्रयोजन के अनुसार कार्य तथा शक्ति का वास्तविक विचार करे। धर्म (कार्य) सिद्धि के लिए बार-बार अनेक रूप धारण करता है।
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