सब विद्वान् लोग इन दोनों (कामज व्यसन-समुदाय तथा क्रोधज व्यसनसमुदाय, दे” ७।४७-४८) की जड़ जिसको जानते हैं, उस लोभ को यत्मपूर्वक जीतें अर्थात् छोड़ दें; क्योंकि ये दोनों (कामजन्य तथा क्रोधजन्य व्यसन-समुदाय) उस (लोभ) से उत्पन्न होने वाले हैं।
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