(राजा) दण्ड सर्वत्र उद्यत रक्खे (हाथी, घोड़ा, रथ और पैदल-- इस प्रकार चतुरङ्गिणी सेना को सर्वदा परेड करवाकर उनका अभ्यास बढ़ाता रहे) अपने पुरुषार्थ (सैनिकादि शक्ति) को प्रदर्शित करता रहे, गुप्त रखने योग्य (अपने विचार, राजकार्य एवं चेष्टा आदि) को सर्वदा गुप्त रखे और शत्रु के छिद्र (सेना या प्रकृति के द्वेष आदि दुर्बलता) को सर्वदा देखता रहे।
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